इंडस्ट्री को उनकी मौजूदगी तो चाहिए, लेकिन उनकी अभिनय-क्षमता की विविधता नहीं; इस तरह वे एक काबिल अभिनेता को महज़ एक एक्सेंट, कॉस्ट्यूम और स्टीरियोटाइप तक सीमित कर देती है.
कभी महरौली, डिप्लोमैट्स की पत्नियों और दिल्ली के फ़्रेंच और अमेरिकन लोगों के बीच एक 'शानदार निजी राज़' हुआ करता था. फिर वहां 'ऑलिव' और डिज़ाइनर स्टोर आए.
सैको की ‘रिपोर्टिंग’ अविश्वसनीय रूप से तह तक जाती है लेकिन कुछ मामलों में वे चूक गए हैं. लेकिन इस वजह से हम उस बात को न ओझल करें जिस पर सैको ने ज़ोर दिया है कि किस तरह स्थानीय झगड़े दंगों का रूप ले लेते हैं.